होम, ऑटो या हेल्थ इंश्योरेंस कराने की सोच रहे हैं, तो मार्च खत्म होने से पहले ही यह काम निपटा डालना आपके लिए फायदेमंद होगा। देर करने पर प्रीमियम भरते वक्त आपको जेब ज्यादा ढीली करनी पड़ सकती है। अप्रैल से स्वास्थ्य, वाहन, मकान का बीमा महंगा हो सकता है। वित्त मंत्रालय ने सरकारी कंपनी जनरल इंश्योरेंस कॉरपोरेशन (जीआईसी) को घाटे वाली बीमा कारोबार को बंद करने को कहा है। मंत्रालय ने कंपनी को चेताया है कि अगर मनाही के बावजूद वह ऐसा करती है, तो घाटे का बोझ उसे खुद उठाना होगा या फिर प्रीमियम की दरें बढ़ानी होंगी। ऐसे में अप्रैल से जनरल इंश्योरेंस पॉलिसियों का महंगा हो जाना तय माना जा रहा है।
बोझ आखिरकार आम बीमा ग्राहकों पर ही आने वाला
सरकारी क्षेत्र की जीआईसी को सरकार की ओर से राष्ट्रीय बीमाकर्ता (नेशनल इंश्योरर) का दर्जा मिला हुआ है। यह सीधे ग्राहकों का बीमा न करके बीमा कंपनियों को बीमा कवर प्रदान करती है। जाहिर है कि जीआईसी अगर अपना प्रीमियम बढ़ाती है, तो कंपनियां इसकी भरपाई ग्राहकों से अधिक प्रीमियम लेकर करेंगी। इस तरह प्रीमियम में बढ़ोतरी का बोझ आखिरकार आम बीमा ग्राहकों पर ही आने वाला है। वित्त मंत्रालय ने 7 फरवरी को जारी अपने एक पत्र में जीआईसी से बीमा कंपनियों को उनके ऐसे बीमा कवर पर रीइंश्योरेंस देने से मना किया है, जिनसे उसे घाटा उठाना पड़े। पत्र के मुताबिक ऐसे बीमा कवर के लिए कंपनियों को खुद रिस्क कवर के इंतजाम करने होंगे या फिर इससे होने वाले घाटे को खुद वहन करना होगा।
कारोबारों में मुनाफे की स्थिति नहीं रही
यह कदम बीमा नियामक इरडा की 2010-11 की सालाना रिपोर्ट को देखते हुए उठाया गया है, जिसके मुताबिक मोटर और स्वास्थ्य बीमे के कारोबार में क्लेम अदायगी की दर क्रमश: 103 और 100 फीसदी रही। इसका मतलब यह हुआ कि वाहन बीमे में कंपनियों को प्राप्त प्रीमियम की कुल राशि से तीन फीसदी ज्यादा का क्लेम भुगतान करना पड़ा जबकि स्वास्थ्य बीमे में यह राशि प्रीमियम की राशि के बराबर रही। इस तरह दोनों ही कारोबारों में मुनाफे की स्थिति नहीं रही और रीइंश्योरेंस के चलते इसका भार जीआईसी पर आया।
पांच फीसदी का रीइंश्योरेंस कराने की बाध्यता
इसके अलावा जीआईसी को उसके द्वारा बीमा कंपनियों को दिए जाने वाले कमीशन के चलते भी नुकसान उठाना पड़ा। मंत्रालय ने जीआईसी से इस कमीशन को भी आधा करने को कहा है। गौरतलब है कि जीआईसी उन कंपनियों को अपना कारोबार चलाने के लिए कमीशन देती है, जिनपर अपने बीमा कारोबार के कम से कम पांच फीसदी का रीइंश्योरेंस कराने की बाध्यता होती है। इस कमीशन में जीआईसी की ओर से कटौती किए जाने का मतलब कंपनियों पर बीमे की लागत बढ़ना होगा, जिसका बोझ ग्राहकों पर आएगा।
कैसे चलता है बीमे का कारोबार
बीमे का कारोबार एक चेन की तरह चलता है, जिसमें कई कड़ियां आपस में जुड़कर अगली कड़ी को सहारा देती हैं। बीमा कंपनी ग्राहकों से प्रीमियम लेकर इसके एवज में उन्हें बीमा कवर उपलब्ध कराती है। यह कंपनियां खुद को घाटे से सुरक्षित रखने के लिए अपने बीमा कारोबार का बीमा दूसरी बड़ी बीमा कंपनी से कराती हैं, जिन्हें कारोबारी भाषा में रीइंश्योरेंस कंपनी कहा जाता है। रीइंश्योरेंस कंपनी बीमा कंपनियों को ऐसी हालत में कवर प्रदान करती है जब उनकी बैलेंस शीट में बीमे के क्लेम की अदायगी का खर्च एक निर्धारित सीमा से अधिक हो जाता है। भारत में यह काम नेशनल इंश्योरर की हैसियत रखने वाली सरकारी कंपनी जीआईसी के पास है। बीमा कंपनियों के पास जहां बीमा प्रस्तावों को मंजूर या नामंजूर करने का विकल्प होता है, वहीं जीआईसी को उसके पास आए प्रस्तावों को स्वीकार ही करना होता है। इस तरह बीमा कंपननियां जीआईसी के सहारे अपने बीमा कारोबार को जोखिम से सुरक्षा प्रदान करती हैं।
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