सरकार के सालाना बजट का समय आ गया है जिसे वित्तमंत्री आगामी 16 मार्च को पेश करेंगे। मंदी के प्रभाव में खड़ी अर्थव्यवस्था को फिर से विकास की तेज रफ्तार पटरी पर लाना सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती है। इस चुनौती को इस तरह से निपटना कि उद्योग जगत से लेकर आम आदमी खुश दिखे, सरकार के लिए और भी गंभीर चुनौती है।
सामने है चौतरफा संकट
ग्लोबल स्तर पर माहौल बेहतर नहीं है, कर संग्रह अपेक्षा से काफी कम है, विकास की गति सुस्त पड़ गई है, महंगाई पर लगाम की हर कवायद बेमानी साबित हो रही है, ब्याजदरें अभी भी आसमान पर हैं। बेरोजगारी का कोई सटीक आंकड़ा सामने नहीं है लेकिन अनुभव बताता है कि देश में एमबीए की एक बड़ी फौज तैयार है जो सटीक अवसर के अभाव में हायर सेंकेंडरी पास की तरह काम करने को मजबूर है।
युवकों में उद्यमशीलता को बढ़ाना होगा
उद्यमशीलता यानी इंटरप्रेन्योरशिप को बढ़ाने का नीतिगत फैसला लेना होगा। इस विषय पर बातें होती रही है, लेकिन इसे शिद्दत के साथ ठोस अंजाम नहीं दिया गया। बजट के जरिए वित्तमंत्री इसे आगे बढ़ा सकते हैं। कई देशों में हायरसेकेंडरी के स्तर पर इंटरप्रेन्योरशिप का पाठ पढ़ाया जाता है। हम भी इसे एक विषय की तरह शामिल कर सकते हैं। सही है कि इंटरप्रेन्योरशिप किताबों से नहीं आती लेकिन अगर जज्बा हो तो ज्ञान इसे धार दे सकता है। एक बार अगर युवकों में इंटरप्रेन्योरशिप की संस्कृति पनप गई तो विकास की तेज धारा को कोई नहीं रोक सकता।
कर संग्रह का चाणक्य फार्मूला
देश के वित्तमंत्री वर्षों से बजट में कर संग्रह का चाणक्य सूत्र दोहराते रहते हैं। कर उसी तरह लिया जाए जैसे मधुमक्खी पुष्प से मकरंद लेती है और शहद बनाती है। लेकिन व्यवहार में यह लागू होता नहीं दिखता। डीटीसी यानी प्रत्यक्ष कर संहिता (नया आयकर कानून) का जब पहला प्रारूप सामने आया था तब लोगों को लगा था सरकार चाणक्य के अर्थनीति की राह पर है। लेकिन बाद के ड्राफ्ट प्रस्ताव में प्रस्तावित नए कानून में कुछ खास नया नहीं दिखा। सरकार अपनी सुपरकंप्यूटराइजेशन के बल पर अधिक से अधिक लोगों को कर दायरे में देखना चाहती है। यह ठीक है, लेकिन कर दर कम हो तो अधिक लोग कर देंगे और उगाही बढ़ेगी। कर के तर्कसंगत होने पर भला कोई क्यों करचोर कहलाना पसंद करेगा। याद कीजिए जब आयकर की अधिकतम सीमा कमाई के 90 फीसदी से भी अधिक थी तो लोग कर चोरी के तमाम उपाय खोजते थे और सरकारी खजाने में कम राजस्व आ पाता था। जैसे-जैसे कर की दरें कम हुई हैं सरकार की प्राप्ति में जबरदस्त बढ़ोतरी हुई है। यही बात सेवाकर पर भी लागू होगी।
टिप्स: भले ही बजट साल के खर्चे का लेखा-जोखा है लेकिन इसे सिर्फ साल तक के लिए ही सीमित नहीं रखा जाता। अब आने वाले वर्षों और दशकों के लिए तय लक्ष्य के हिसाब से बजट को सीढ़ी की तरह प्रयोग करना होगा जिससे कि समाज का चौतरफा विकास हो।
(अगले अंक में बजट से जुड़ी कुछ और चर्चा)
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