शेयर बाजार में आईपीओ के नाम पर जो घोटाले सामने आए हैं उससे आईपीओ के प्रति आम निवेशकों का लगातार मोहभंग हो रहा है। सवाल यह है कि क्या आईपीओ अब निवेश के लायक रहे ही नहीं? ऐसा नहीं है, बल्कि यह कहें कि घोटालों के उजागर होने के बाद सेबी तेजी से हरकत में आया और कंपनियों के खिलाफ कार्रवाई भी की। इसका नतीजा यह आएगा कि भविष्य में दूसरी कंपनियां इस तरह की हरकतों से बाज आएंगी।
रकम का हुआ बेजा इस्तेमाल
आईपीओ में कई तरह से हेरफेर के मामले उजागर हुए। आईपीओ की लिस्टिंग से पहले ही ऑपरेटरों को कैश डिस्कांउट से लेकर मिलने वाली रकम का दुरुपयोग किया जाना आदि शामिल हैं।
निवेशक कैसे करें अपना बचाव
सेबी के नियमों के अनुसार आईपीओ के लिए कंपनी द्वारा जारी दस्तावेज में कंपनी से जुड़ी सभी जानकारी का खुलासा होना चाहिए। आईपीओ के लिए सेबी का यह नियम काफी पुराना है, बावजूद इसके बीते कुछ मामलों में सेबी ने गलतबयानी का मामला पकड़ा। निवेशक दस्तावेज से ही कंपनी के बारे में अपनी राय बनाते हैं और निवेश के निर्णय लेते हैं। कंपनी ने जो भी जानकारी दी है इसकी पुष्टि की जिम्मेदारी लीड मैनेजर की होती है। इसलिए बीते मामलों में जब कंपनी की गलतबयानी पकड़ी गई, तो लीड मैनेजर पर भी सेबी ने कार्रवाई की। निवेश बैंकरों पर कार्रवाई का आईपीओ बाजार के भविष्य पर अच्छा प्रभाव पड़ना चाहिए। बाजार में प्रतिष्ठा जाने और आगे काम न मिलने के खतरे के कारण निवेश बैंकर अपनी सही भूमिका निभाएंगे।
तुरंत मुनाफे के लिए नहीं है आईपीओ
एक-डेढ़ दशक पहले आईपीओ तत्काल लाभ का जरिया बन गया था। उस समय बुक बिल्डिंग के जरिये आईपीओ के भाव तय नहीं होते थे। अब बुक बिल्डिंग के जरिये भाव तय होते हैं और माना जाता है कि अक्सर ये काफी ऊंचे होते हैं। ऐसे में निवेशकों को आनन-फानन में लाभ नहीं मिलता।
जरूर देखें कंपनी की रेटिंग और इतिहास
कंपनी के बारे में जानकारी के लिए इनकी रेटिंग जरूर देखें। यह रेटिंग एक से पांच के स्केल में होती है। स्वतंत्र संस्था की इस रेटिंग से कंपनी के बारे में ठीक जानकारी मिल जाती है। देखें कि बैंकर के पुराने इश्यू किन कंपनियों के थे और कितने सफल रहे। इसी तरह प्रोमोटर का इतिहास कैसा रहा है। यह भी जरूर देख लें कि प्रोमोटर और निदेशकों के खिलाफ कोई अदालती मामले नहीं हैं अगर हैं तो किस तरह के।
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