ब्रिटेन में एक गुरुद्वारे में काम करने वाले एक वालंटियर ने न्यूनतम वेतन पाने के हक की लड़ाई जीत ली है। इस वालंटियर को अभी तक श्रद्धालुओं से आने वाले दान से हर हफ्ते 50 पाउंड मिलते थे। ब्रिस्टल के एक गुरुद्वारे में 2009 तक तेजिंदर सिंह ने एक ग्रंथी के रूप में काम किया। सिंह ने पिछले साल ट्रिब्यूनल में दावा किया था कि वह एक वालंटियर के रूप में काम करने को तैयार हुआ था। इस वजह से उसे न्यूनतम वेतन दिया जाना चाहिए, जोकि वर्तमान में 6.08 पाउंड प्रति घंटे निर्धारित किया गया है।
हजारों लोगों को सैलरी देने को कहा जा सकता है
उसने खुद और पत्नी के लिए गुरुद्वारा द्वारा उपलब्ध कराए गए फ्री आवास को स्वीकार किया था। इसके साथ ही उसे श्रद्धालुओं से आने वाले दान की रकम से हर हफ्ते 50 पाउंड दिए जाते थे। द डेली मेल की रिपोर्ट के अनुसार, सिंह के पक्ष में आए फैसले का मतलब है कि धार्मिक संस्थाओं, चैरिटी और वे समूह जो कि पूरी तरह से वालंटियर की मदद पर निर्भर हैं, को अब हजारों लोगों को सैलरी दिए जाने के लिए कहा जा सकता है।
स्वेच्छा से काम करने के सिद्धांतों के खिलाफ
अभी तक यह माना जाता था कि वालंटियर अपनी मदद मुफ्त में दे रहे हैं। समाचार पत्र के मुताबिक, गुरुद्वारा मैनेजरों ने इसके पहले कहा था कि सिंह को वेतनभोगी मानना सिख शास्त्रों की पारंपरिक व्याख्या और नियमों तथा स्वेच्छा से काम करने के सिद्धांतों के खिलाफ होगा। पिछले साल ट्रिब्यूनल ने कहा था कि सिंह वर्कर होने के काबिल नहीं है, लेकिन रोजगार अपील ट्रिब्यूनल के जज बीटसन ने कहा कि यह गलत था और मामले पर फिर से विचार के लिए उसी ट्रिब्यूनल में भेज दिया था।
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