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पांचवां चरण : विरोधियों और बागियों की चुनौती

लखनऊ।
Story Update : Thursday, February 23, 2012    12:12 AM
Fifth step the challenge of opponents and rebels

पांचवें चरण में 13 जिलों की 49 सीटों के लिए आज मतदान होना है। सभी तैयारियां पूरी हैं। लगभग डेढ़ करोड़ मतदाता 829 प्रत्याशियों के भाग्य का फैसला करेंगे। विधानसभा सीटें जहां मतदान होने हैं : टूंडला (आरक्षित), जसराना, फीरोजाबाद, शिकोहाबाद, सिरसागंज, कासगंज, अमनपुर, पटियाली, अलीगंज, एटा, मरहरा, जलेसर (आरक्षित), मैनपुरी, भोंगाव, किशनी (आरक्षित), करहल, जसवंतनगर, इटावा, भरथना (आरक्षित), बिधूना, डिबियापुर, औरैया (आरक्षित), रसूलाबाद (आरक्षित), अकबरपुर-रानिया, सिकंदरा, भोगनीपुर, बिल्हौर (आरक्षित), बिठूर, कल्याणपुर, गोविंदनगर, सीसामऊ, आर्यनगर, किदवईनगर, कानपुर कैंट, महराजपुर, घाटमपुर (आरक्षित), माधौगढ़, कालपी, उरई (आरक्षित), बबीना, झांसी नगर, मऊरानीपुर (आरक्षित), गरौठा, ललितपुर, महरोनी (आरक्षित), हमीरपुर, राठ (आरक्षित), महोबा और चरखारी।


बसपा : राह में बागियों ने बिछाए कांटे
पांचवां चरण बसपा के लिए इस मायने में अहम हेै कि वह अपने सर्वाधिक चर्चित बागी बाबूसिंह कुशवाहा के असर से कैसे निपट पाती है। केवल कुशवाह ही नहीं बादशाह सिंह भी बसपा के खिलाफ भाजपा का झंडा बुलंद किए हुए हैं। इस लिहाज से बुंदेलखंड में बसपा की राह में कुछ ज्यादा ही कांटे हैं। एक ओर बाबूसिंह कुशवाहा घूम-घूम कर पिछड़े वर्ग की उपेक्षा का सवाल उठा कर बसपा के लिए मुश्किलें पैदा कर रहे हैं तो भाजपा का झंडा उठाये बादशाह सिंह क्षत्रिय स्वाभिमान पर जनता को मथने की कोशिश कर रहे हैं।

पिछले चुनाव में बसपा ने इन क्षेत्रों की 53 सीटों में से 27 सीटें जीत कर फीरोजाबाद से लेकर महोबा तक अपनी जीत का डंका बजाया था। लेकिन अब बदलते हालात में बसपा को विरोधियों से कड़े संघर्ष का सामना करना पड़ रहा है। बुंदेलखंड की ज्यादातर सीटों पर कब्जा करने वाली बसपा को अपने घटते असर का अहसास तो लोकसभा 2009 के चुनाव में हो गया था जब उसे यहां की चार सीटों में से केवल एक सीट मिली थी। इस बार उसने एंटी इन्कम्बेंसी के खतरे को कम से कम करने की गरज से यहां एक को छोड़ कर अपने सभी सिटिंग विधायकों का टिकट काट दिया । लेकिन इसके बाद भी बात बनती नहीं दिख रही है।


अब इस इलाके में बागी बाबूसिंह कुशवाहा व उमा भारती का प्रचार जोरदार चल रहा है। इन दोनों के अलग-अलग आक्रामक प्रचार से भाजपा यहां बढ़त में दिखती है। इसका सीधा नुकसान बसपा को हो सकता है। कुशवाहा की जनसभाओं में उमड़ रही भीड़ से तो बसपा नेता भी हैरान हैं। बसपा के महासचिव नसीमुद्दीन सिद्दीकी के लिए तो सबसे बड़ी चुनौती कुशवाहा के असर को कम करने की है। इसी क्षेत्र में बादशाह सिंह हाथी की सवारी छोड़ भाजपा का कमल लेकर चुनाव लड़ रहे हैं। बुंदेलखंड से बाहर निकलें तो एटा में बसपा प्रदेश अध्यक्ष स्वामी प्रसाद मौर्य की बेटी संघमित्रा गौतम की राह भी आसान नहीं है।

सपा : घर को गढ़ बनाने की चुनौती
पांचवां चरण सपा के लिए इसलिए बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि इस चरण में उसके गढ़ इटावा, मैनपुरी और औरेया सरीखे जिलों में भी वोट पड़ना है। नेता विरोधी दल शिवपाल सिंह यादव को जसवंतनगर में अपनी पकड़ एक बार फिर साबित करनी होगी। मैनपुरी के अलावा बहू डिम्पल की हार का गवाह बने फीरोजाबाद जिले में भी मुलायम को इसी चरण में अपनी पकड़ साबित करनी है। पिछली बार इस इलाके में सपा को कुल 53 में से केवल 14 सीटें ही मिली थीं। बसपा ने इटावा और मैनपुरी में दखल बढ़ाया था।

मुलायम, अखिलेश और शिवपाल ने इन जिलों में अपनी पुरानी जैसी पकड़ बनाने के लिए इस बार मेहनत भी काफी की है। इटावा में चार सीटें थीं। सपा का गढ़ भेदते हुए पिछली बार बसपा ने तीन पर कब्जा कर लिया था। केवल जसवंतनगर सीट ही सपा के पास रह गई। सपा को इस बार जिले की अन्य सीटों पर कब्जा करना चुनौती बना हुआ है। सपा सरकार में इटावा और सैफई के महत्व और 24 घंटे बिजली मिलने को मुद्दा बनाकर यादव परिवार जिले में बढ़त बनाने की जुगत में है। वहीं मैनपुरी में मुलायम की आन-बान को दांव बनाकर वर्चस्व साबित करने की कोशिश है।

बुंदेलखंड के जालौन, झांसी, हमीरपुर, महोबा, ललितपुर में पिछली बार बसपा ने सपा को तगड़ा झटका दिया था। एंटीइनकम्बेंसी के अलावा कुर्मियों व ठाकुरों के जातीय आधार को अपने पक्ष में लामबंद कर सपा इस बार बसपा को पटकनी देने की फिराक में है। पर अलग बुंदेलखंड राज्य का विरोध करने के कारण सपा प्रत्याशियों को जहां-तहां आम मतदाता का विरोध झेलना पड़ रहा है। सपा नेता इस मसले पर तार्किक सफाई नहीं पेश कर पा रहे हैं। एटा, रमाबाईनगर व कांशीरामनगर में दो-चार सीटों को छोड़ सपा प्रत्याशियों को बसपा से ही जूझना पड़ रहा है। कानपुर शहर में भी सपा ने मेहनत खूब की है, पर सीसामऊ, कल्याणपुर को छोड़ किसी अन्य सीट पर वह एंटीइनकम्बेंसी का पूरा फायदा लेती नहीं दिख रही है।

कांग्रेस : दिग्गजों का इम्तिहान
केंद्र से लेकर प्रदेश तक की सियासत में अहम भूमिका निभाने वाले मध्य यूपी व बुंदेलखंड में इस बार कांग्रेस के कई दिग्गजों का इम्तिहान होगा। कानपुर में केंद्रीय कोयला मंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल की प्रतिष्ठा दांव पर है तो झांसी में केंद्रीय ग्राम्य विकास राज्यमंत्री प्रदीप जैन आदित्य व फीरोजाबाद में सांसद राज बब्बर की लोकप्रियता मतदाताओं की कसौटी पर होगी। सोनिया गांधी, राहुल गांधी से लेकर प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह व कांग्रेस के अन्य दिग्गज नेताओं ने इस इलाके में कांग्रेस की खोई जमीन वापस पाने के लिए खासी मेहनत भी की है। कानपुर और फिरोजाबाद के दम तोड़ते उद्योगों, बुनियादी सुविधाओं के अभाव, तथा बुंदेलखंड की बदहाली जैसे मुद्दों के जरिये कांग्रेस वोटरों को समर्थन हासिल करने की जुगत में लगी है। राहुल गांधी कानपुर में श्रीप्रकाश से कह भी चुके हैं कि पूरे प्रदेश की जिम्मेदारी वह खुद उठा रहे हैं। कानपुर की सीटें जिताने की जिम्मेदारी उनके (श्रीप्रकाश) के ऊपर है।

2007 के चुनाव में इस क्षेत्र से कांग्रेस की झोली में चार सीटें आई थीं। पार्टी की कोशिश इस बार बढ़त लेने की है। कानपुर और बुंदेलखंड से कांग्रेस ने ज्यादा ही उम्मीदें लगा रखी हैं। उरई और झांसी की सीट कांग्रेस के लिए नाक का सवाल बनी है तो कानपुर में भी दोनों सीटों को बरकरार रखते हुए बढ़त हासिल करने की चुनौती है। राहुल गांधी तो दो साल पहले से ही बुंदेलखंड की खाक छान रहे हैं। बुंदेलखंड की चिंता और पैकेज का कांग्रेस को कितना फायदा हुआ, चुनाव के नतीजे यह भी साफ करेंगे। हालांकि विकास एवं अन्य स्थानीय मुद्दों पर जातीय समीकरणों के हावी होने से कई सीटों पर कांग्रेस उम्मीदवारों को कड़ा संघर्ष करना पड़ रहा है। टिकट बंटवारे को लेकर भी कांग्रेस में असंतोष है जिसका नुकसान पार्टी उम्मीदवारों को उठाना पड़ सकता है। कानपुर में राहुल के रोड शो से भी कांग्रेसियों में उम्मीदें जगी हैं। पार्टी नेताओं की मानें तो इस बार कांग्रेस कानपुर तथा आसपास और बुंदेलखंड की सीटों पर अच्छा प्रदर्शन करने जा रही है ।

भाजपा : पार्टी का एजेंडा दांव पर
पांचवें चरण में महोबा से फीरोजाबाद के बीच की पट्टी पर हो रहे चुनाव में भाजपा का बहुत कुछ दांव पर लगा हुआ है। पार्टी नेताओं की नीति और निर्णय, भाजपा का एजेंडा और दावा सभी की परीक्षा एक साथ होनी है। इसी के साथ इस रहस्य से भी परदा उठेगा कि बाबू सिंह कुशवाहा भाजपा के लिए कितने करिश्माई रहे और उमा भारती का जादू कितना चला। पिछड़ों के हक को मुद्दा बनाकर मुस्लिम आरक्षण के खिलाफ आस्तीन चढ़ाने का असर यहां के गरीबों और पिछड़ों में कितना पड़ा। जनसंघ की स्थापना से जुड़ी जमीन कानपुर के लोगों का भाजपा पर कितना भरोसा है। बुंदेलखंड तथा कानपुर को बदहाली से उबारने की भाजपा नेताओं की घोषणाएं लोगों पर कितना असर डाल पाई हैं। यह सब इन सीटों पर भाजपा के खाते में आए वोटों से पता चलेगा।

पांचवें चरण में जिन 13 जिलों में चुनाव हो रहा है, उनमें इस बार 49 सीटें है जबकि 2007 के चुनाव में 53 सीटें थीं। परिसीमन के चलते चार सीटें घट गई है। भाजपा के यहां छह विधायक जीते थे। इन छह विधायकों में एक जलेसर से कुबेेरनाथ अगरिया की जगह उनकी पत्नी मिथिलेश अगरिया को चुनाव मैदान में उतारा है। मैनपुरी से विधायक अशोक सिंह चौहान बसपा में जाकर लौट तो आए लेकिन उन्हें टिकट नहीं मिला है। इसके अलावा उनमें भाजपा अपने सभी मौजूदा विधायकों कल्याणपुर से प्रेमलता कटियार, महाराजपुर से सतीश महाना, आर्यनगर से सलिल विश्नोई, एटा से प्रजापालन वर्मा को चुनाव मैदान में फिर उतारा है।

पांचवें चरण के लिए गुरुवार को जिन सीटों पर चुनाव होना है, उसमें चरखारी सीट से खुद उमा भारती मैदान में हैं। जाहिर है कि यहां भाजपा के खाते में आने वाला वोट यह बताएगा कि सूबे में भाजपा की नैया पार लगाने आई उमा जमीन पर कहां ठहरती है। भाजपा के वरिष्ठ नेता पूर्व विधायक सत्यदेव पचौरी, पार्टी उपाध्यक्ष व पूर्व विधायक स्वतंत्र देव सिंह, संतराम सिंह सेंगर, पूर्व सांसद साक्षी महराज, कमलारानी वरुण, पूर्व विधायक अनिल यादव, पूर्व मंत्री बादशाह सिंह और साध्वी निरंजन ज्योति की भी इसी चरण में परीक्षा होनी है।

अन्य दल : दांव पर कल्याण राजा बुंदेला का दमखम
पांचवे चरण की 49 सीटों पर चार प्रमुख दलों के साथ जनक्रांति पार्टी (राष्ट्रवादी) के संरक्षक कल्याण सिंह और बुंदेलखंड कांग्रेस के अध्यक्ष राजा बुंदेला का दमखम देखा जाएगा। कल्याण सिंह का संसदीय क्षेत्र होने के नाते एटा और कांशीराम नगर पर सबकी नजर होगी। कांशीराम नगर के लोधी बाहुल्य कासगंज, अमापुर और एटा की अलीगंज और मारहरा में कल्याण की पार्टी पूरा जोर लगाए हुए हैं। इसके अलावा आधा दर्जन सीटों पर उनके प्रत्याशी मजबूती से लड़ रहे हैं। पृथक बुंदेलखंड के मुददे को लेकर मैदान में उतरे राजा बुंदेला का कद भी इसी चरण में तय होना है। झांसी में उनकी प्रतिष्ठा दांव पर लगी हुई है। वह सभी सीटों पर पृथक राज्य की स्थापना के लिए जनादेश मांग रहे हैं। एक-दो सीटों पर पीस पार्टी मजबूती दिखा रही है।


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